Class 10 Sanskrit Chapter 1 Saransh (सारांश) Hindi Anuvad
shuchi paryavaranam class 10 sanskrit chapter 1 saransh aur anuvad आधुनिक संस्कृत कवि हरिदत्त शर्मा द्वारा रचित ‘शुद्ध पर्यावरणम्’ कविता विश्वव्यापी पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से प्रेरित है। कवि कहते हैं कि आज निरन्तर बढ़ते प्रदूषण से सम्पूर्ण विश्व पीड़ित है। पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और तेज ये पाँचों तत्व प्रदूषित हो गए हैं, जिसके कारण इस संसार में जीवन दूभर हो गया है और मानव मन को कहीं भी शांति नहीं मिल रही है। ऐसी स्थिति में एकमात्र सहारा शुद्ध पर्यावरण ही है।

अंत में कवि कहता है कि लता, वृक्ष और झाड़ियाँ पत्थरों के तल पर अर्थात पाषाणकालीन सभ्यता में नष्ट नहीं होनी चाहिए। वह मानव जीवन की कामना करता है, जीवन के नाश की नहीं। इसलिए अंत में वह यही संदेश देता है कि शुद्ध पर्यावरण की शरण में ही जाना चाहिए, यही एकमात्र आश्रय है।
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कवि ने आधुनिक यंत्रजाल को लोहे के पहिये के रूप में बताया है, जो दिन-रात महानगरों में टेढ़ा-मेढ़ा घूमता रहता है। यह पहिया मन का शोषण करता है, शरीर को पीसता है और अपने विकराल दाँतों से मानव का विनाश कर रहा है। इससे बचने के लिए शुद्ध पर्यावरण की शरण में जाना चाहिए।
आगे कवि कहते हैं कि सैकड़ों मोटरगाड़ियाँ काजल के समान काला धुआँ छोड़ रही हैं, शोर करती हुई रेलगाड़ियों की पंक्तियाँ निरन्तर दौड़ रही हैं और वाहनों की असीमित पंक्तियों के कारण रास्ते में चलना भी मुश्किल हो गया है।
वायुमण्डल अत्यधिक दूषित हो गया है, पानी भी स्वच्छ नहीं रहा, खाने की वस्तुएँ भी दूषित पदार्थों से युक्त हैं और धरती मैली हो गई है। इसलिए बाहरी और आंतरिक दोनों जगत में अत्यधिक शुद्धीकरण की आवश्यकता है।
इन सब से दुखी होकर कवि कामना करता है कि उसे कुछ समय के लिए इस शहर से बहुत दूर ले जाया जाए। वह गाँव की सीमा पर जल से भरे झरने और नदी को देखना चाहता है, निर्जन शांत वन में एक क्षण घूमना चाहता है। उसे हरे-भरे वृक्षों, सुंदर बेलों और हवा से हिलती हुई फूलों की पंक्तियाँ प्रिय हैं। जहाँ नवमल्लिका आम के वृक्ष के साथ सुंदर संगम कर रही है, ऐसा स्वच्छ वातावरण ही उसे चाहिए।