NCERT Solutions for Class 11 Sanskrit Chapter 1 कुशलप्रशासनम् Hindi Translation & Questions Answers
इस पोस्ट में हमने Class 11 Sanskrit Bhaswati Chapter 1 कुशलप्रशासनम् का सम्पूर्ण हिंदी अनुवाद सरल भाषा में दिया है।साथ ही Class 11th Sanskrit Chapter 1 के सम्पूर्ण अभ्यास प्रश्नों के उत्तर भी सरल भाषा में लिखे गए हैं।
इस पोस्ट में आपको मिलेगा:
मातुराज्ञा गरीयसी का हिन्दी अनुवाद
पाठ के सभी प्रश्नोत्तर
Chapter 1 के Notes

प्रस्तुत अंश महर्षि वाल्मीकि प्रणीत रामायण के अयोध्याकाण्ड के सौवें (100वें) सर्ग से संकलित है। भगवान श्रीराम पितृ-आज्ञा का पालन करते हुए चित्रकूट में वनवास कर रहे हैं। भ्रातृ-विरह से व्याकुल भरत उनसे मिलने चित्रकूट आते हैं। भेंट होने के पश्चात् श्रीराम भरत से अयोध्या की कुशल-क्षेम और राज्य-व्यवस्था के संबंध में प्रश्न करते हैं।
यहाँ कक्षा 11 के सभी विषयों के बारे में पढ़ें।
इस प्रकरण में श्रीराम भरत से राजनीति, प्रशासन और शासन-संचालन से संबंधित अनेक गंभीर प्रश्न पूछते हैं, जिनसे राजनीति-शास्त्र और प्रशासन-विज्ञान पर महत्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है।
जैसे — क्या उन्होंने मंत्रियों की नियुक्ति शास्त्रोक्त योग्यताओं के अनुसार की है? क्या मंत्रणा शास्त्र-विधि के अनुसार गुप्त रूप से की जाती है? क्या सैनिकों और कर्मचारियों को वेतन-भत्ते का भुगतान समय पर किया जाता है? आदि। प्रशासनिक व्यवस्था और राजधर्म की दृष्टि से यह पाठ्यांश अत्यंत महत्वपूर्ण है और इन्हीं बिंदुओं पर इसमें विशद विवेचन किया गया है।
जटिलं चीरवसनं प्राञ्जलिं पतितं भुवि।
ददर्श रामो दुर्दर्श युगान्ते भास्करं यथा ।।1
अनुवाद: जटाओं को धारण किए, वल्कल वस्त्र पहने, हाथ जोड़े खड़े, करुणा-भरे नेत्रों से देखने योग्य भरत को, श्रीराम ने ऐसे देखा जैसे प्रलय काल में पृथ्वी पर सूर्य आ गिरा हो।
कथञ्चिदभिविज्ञाय विवर्णवदनं कृशम्।
भ्रातरं भरतं रामः परिजग्राह पाणिना ।।2।।
अनुवाद: उदास मुख वाले और दुर्बल शरीर वाले अपने भाई भरत को जैसे-तैसे पहचान कर, श्रीराम ने उन्हें अपनी भुजाओं में भर लिया।
आघ्राय रामस्तं मूर्धिन परिष्वज्य च राघवम्।
अङ्के भरतमारोप्य पर्यपृच्छत सादरम्।॥३॥
अनुवाद: श्रीराम ने रघुकुल के भूषण भरत का मस्तक सूँघा, उन्हें हृदय से लगाया, गोद में बैठाया और फिर बड़े प्रेम और आदर के साथ उनसे कुशल-क्षेम पूछा।
कच्चिदात्मसमाः शूराः श्रुतवन्तो जितेन्द्रियाः। कुलीनाश्चेङ्गितज्ञाश्च कृतास्ते तात मन्त्रिणः ॥4॥
अनुवाद: हे तात! क्या तुमने अपने ही समान पराक्रमी, शास्त्रों के ज्ञाता, जितेन्द्रिय, उत्तम कुल में उत्पन्न और दूसरों के मुख के भाव देखकर ही मन की बात समझ लेने वाले मंत्रियों को नियुक्त कर रखा है?
मन्त्रो विजयमूलं हि राज्ञां भवति राघव !।
सुसंवृतो मन्त्रिधुरैरमात्यैः शास्त्रकोविदैः ।॥5॥
अनुवाद: हे रघुनन्दन! उत्तम मंत्रणा ही राजाओं की विजय का मूल कारण है, और वह मंत्रणा तभी सफल होती है जब नीतिशास्त्र में निपुण श्रेष्ठ मंत्री उसे पूरी तरह से गुप्त रखते हैं।
कच्चिन्निद्रावशं नैषि कच्चित्कालेऽवबुध्यसे । कच्चिच्चापररात्रेषु चिन्तयस्यर्थनैपुणम् ।।6।।
अनुवाद: हे भरत! क्या तुम कभी असमय में नींद के वश में तो नहीं हो जाते? तुम समय पर जाग जाते हो न? और रात्रि के अंतिम प्रहर में अपने राज्य-कार्य की सिद्धि के विषय में विचार करते हो न?
कच्चिन्मन्त्रयसे नैकः कच्चिन्न बहुभिः सह।
कच्चित्ते मन्त्रितो मन्त्रो राष्ट्र न परिधावति ॥7॥
अनुवाद: क्या तुम किसी गूढ़ विषय पर अकेले ही विचार तो नहीं कर लेते? अथवा बहुत से लोगों के साथ बैठकर मंत्रणा तो नहीं करते? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारी गुप्त मंत्रणा निश्चय होने से पहले ही शत्रु के राज्य तक पहुँच जाती हो?
कच्चिदर्थं विनिश्चित्य लघुमूलं महोदयम्।
क्षिप्रमारभसे कर्म न दीर्घयसि राघव ! ॥৪॥
अनुवाद: हे राघव! जिस कार्य में साधन थोड़े लगें पर फल बड़ा हो, ऐसे कार्य का निश्चय करके तुम उसे शीघ्र ही आरम्भ कर देते हो न? उसमें देर तो नहीं करते?
कच्चित्सहस्त्रान्मूर्खाणामेकमिच्छसि पण्डितम्।
पण्डितो ह्यर्थकृच्छ्रेषु कुर्यान्निःश्रेयसं महत्। ॥१॥
अनुवाद: क्या तुम हजारों मूर्खों के बदले एक विद्वान को अपने पास रखना चाहते हो? क्योंकि एक बुद्धिमान पुरुष भी धन-संकट के समय महान कल्याण कर सकता है।
एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दक्षो विचक्षणः।
राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम्।।10।
अनुवाद: यदि एक ही मंत्री मेधावी, शूरवीर, कार्यकुशल और नीतिशास्त्र का ज्ञाता हो, तो वह राजा अथवा राजकुमार को बहुत बड़ी धन-संपत्ति प्राप्त करा सकता है।
कच्चिन्मुख्या महत्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमाः।
जघन्याश्च जघन्येषु भृत्यास्ते तात योजिताः ॥11॥
अनुवाद: हे तात! क्या तुमने श्रेष्ठ पुरुषों को उत्तम कार्यों में, मध्यम श्रेणी के पुरुषों को मध्यम कार्यों में और निम्न श्रेणी के पुरुषों को छोटे कार्यों में नियुक्त कर रखा है?
अमात्यानुपधातीतान्पितृपैतामहाञ्छुचीन्।
श्रेष्ठाञ्छ्रेष्ठेषु कच्चित्त्वं नियोजयसि कर्मसु ।।12।
अनुवाद: क्या तुम उन्हीं अमात्यों को उत्तम कार्यों में नियुक्त करते हो, जो घूस नहीं लेते हों, जो तुम्हारे पिता-पितामह के समय से कार्य करते आ रहे हों और जो पूर्णतः पवित्र तथा श्रेष्ठ हों?
कच्चिद्धृष्टश्च शूरश्च धृतिमान्मतिमाञ्छुचिः। कुलीनश्चानुरक्तश्च दक्षः सेनापतिः कृतः ।॥13॥
अनुवाद: क्या तुमने किसी के दबाव में न आने वाले, शूरवीर, धैर्यवान, बुद्धिमान, पवित्र आचरण वाले, उत्तम कुल में उत्पन्न, तुमसे ही प्रेम रखने वाले और युद्ध-कला में निपुण पुरुष को ही सेनापति बनाया है?
कच्चिद्बलस्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम्।
सम्प्राप्तकालं दातव्यं ददासि न विलम्बसे ॥14॥
अनुवाद: सैनिकों के लिए जो निश्चित और उचित वेतन और भत्ता तय है, उसे तुम समय पर दे देते हो न? देने में देरी तो नहीं करते?
कालातिक्रमणाच्चैव भक्तवेतनयोर्भूताः । भर्तुरप्यतिकुप्यन्ति सोऽनर्थः सुमहान्स्मृतः ।॥15॥
अनुवाद: यदि समय बीत जाने पर वेतन और भत्ता दिया जाता है, तो सैनिक अपने स्वामी से बहुत अधिक क्रोधित हो जाते हैं, और इससे बहुत बड़ा संकट भी उत्पन्न हो सकता है।
- संस्कृतेन उत्तरं देयम्
(क) अयं पाठः कस्माद् ग्रन्थात् सङ्कलितः ?
उत्तर अयं पाठः वाल्मीकिरामायण ग्रन्थात् सङ्कलितः।
(ख) जटिलः चीरवसनः भुवि पतितः कः आसीत्?
उत्तर जटिलः परिवसनः भुवि पतितः भरतः आसीत्।
(ग) रामः कं पाणिना परिजग्राह ?
उत्तर रामः स्वभ्रातरं पाणिना परिजग्राह।
(घ) भरतं कः अपृच्छत्?
उत्तर भरतं रामः अपृच्छत्।
(ङ) राज्ञां विजयमूलं किं भवति ?
उत्तर राज्ञां विजयमूलं सुसंवृत्तः मन्त्रः भवति।
(च) राज्ञः कृते कीदृशः अमात्यः क्षेमकरः भवेत् ?
उत्तर प्रजः कृतं मेधावी शुचिः दक्षः विचक्षणः च श्रमकरः भवति।
(छ) सेनापतिः कीदृग् गुणयुक्तः भवेत् ?
उत्तर सेनापतिः धृष्टः शुचिः धृतिमान् धीमान् मतिमान् शुचिः शक्तिः अनुस्वतः च भवेत्।
(ज) बलेभ्यः यथाकालम् किं दातव्यम् ?
उत्तर बलेभ्यः यथाकाल भक्तं वेतनं दातव्यम्।
(झ) मन्त्रः कीदृशः भवति ?
उत्तर मन्त्रः सुसंवृतः भवति।
(ञ) मेधावी अमात्यः राजानं काम् प्रापयेत्?
उत्तर मेधावी अमात्यः राजानं महतीं श्रियं प्रापयेत्। - रिक्तस्थानपूर्तिः क्रियताम्
(क) रामः ददर्श दुर्दर्श युगान्ते भास्करं यथा।
(ख) अङ्के भरतम् आरोप्य रामः सादर पर्यपृच्छत।
(ग) कच्चित् काले अवबुध्यसे?
(घ) पण्डितः हि अर्थकृच्छेषु महत् निःश्रेयसं कुर्यात्।
(ङ) श्रेष्ठाञ्छ्रेष्ठेषु कच्चित् एवं कर्मसु नियोजयसि। - अधोलिखितपदानाम् उचितमर्थं कोष्ठकात् चित्वा लिखत
(क) दुर्दर्शम् – कठिनाई से देखने योग्य।
(ख) परिष्वज्य – आलिंगन करके।
(ग) आघ्राय – सूंघकर।
(घ) मूर्धिन –
(ङ) निःश्रेयसम् – कल्याण को।
(च) विचक्षणः – निपुण
(छ) बलस्य – सेना का। - विपरीतार्थमेलनं क्रियताम्
एक: -बहवः
शनैः – क्षिप्रम्
मूर्खः – पण्डितः
लघु – महत् - सन्धिविच्छेदः क्रियताम्
यथा- कुलीनश्च = कुलीनः + च
भृत्याश्च = भृत्या:+च
धृष्टश्च = धृष्ट:+च
अनुरक्तश्च = अनुरक्त:+च
शूरश्च = शूर:+च - अधोलिखितेषु शब्देषु प्रकृतिं प्रत्ययं च पृथक् कुरुत
पतितम्, आघ्राय, मन्त्रिणः, पण्डिताः, मेधावी, दातव्यम्, स्मृतः।
