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Reading: Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 2 नित्यं पिबामः सुभाषितरसम् | Hindi Anuvad, Question Answer
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Sanskrit Dhara Vahini > Class 7 > Class 7 Sanskrit > Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 2 नित्यं पिबामः सुभाषितरसम् | Hindi Anuvad, Question Answer
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Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 2 नित्यं पिबामः सुभाषितरसम् | Hindi Anuvad, Question Answer

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NCERT Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 2 Nityam Pibamah Subhashitarasam (‘नित्यं पिबामः सुभाषितरसम्’) हमें आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देता है। प्रस्तुत पाठ में अनेक सुभाषितों यानी सुन्दर नीतिवचनों के माध्यम से बताया गया है कि एक आदर्श जीवन के लिए कौन से गुण आवश्यक हैं। इसमें नैतिकता, सत्कर्म की महत्ता और सच्ची विद्या के महत्व को दर्शाया गया है, साथ ही निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध जैसे अवगुणों से दूर रहने की सीख दी गई है। इस पाठ के सभी श्लोकों का हिंदी अनुवाद और प्रश्नों सरल भाषा में समझाया गया है।

 Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 2 Nityam Pibamah Subhashitarasam
NCERT Class 7 Sanskrit Deepakam Bhag 2 Chapter 2 Solutions – Nityam Pibamah Subhashitarasam

Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 2 Nityam Pibamah Subhashitarasam Question Answer

वस्त्रेण वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च। वकारैः पञ्चभिर्युक्तो नरो भवति पूजितः ।।।

जो व्यक्ति अच्छे वस्त्र पहनता है, शरीर से स्वस्थ होता है, सदा मधुर और हितकारी वचन बोलता है, हमेशा पढ़ाई में लगा रहता है और विनम्रता से व्यवहार करता है-ऐसा मनुष्य इन पाँच ‘व’ (वस्त्र, शरीर, वाणी, विद्या, विनय) से युक्त होकर समाज में आदर-सम्मान प्राप्त करता है।

Class 7 Sanskrit Chapter 1 Vande Bharat Mataram वन्दे भारतमातरम् Questions answers

षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता । निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥

हमारे भीतर नींद, सुस्ती, डर, क्रोध, कामचोरी और पुरानी शत्रुता-ये छह दोष होते हैं। ये सभी दोष हमारे ऐश्वर्य और उन्नति में बाधा उत्पन्न करते हैं। इसलिए, यदि कोई मनुष्य अपने जीवन में धनवान बनना चाहता है, विद्वान बनना चाहता है, या किसी प्रकार का ऐश्वर्य, वैभव प्राप्त करना चाहता है, ततेो उसे अत्यधिक नींद लेना, सुस्त और आलसी रहना, डरना, गुस्सा करना, काम को टालना या देर से करना और दूसरों से लंबे समय तक दुश्मनी रखना-इन छह दोषों को पूरी तरह से त्याग देना चाहिए

अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति । विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिज्ञानेन शुध्यति ॥

प्रतिदिन स्नान करने से मनुष्य का शरीर स्वच्छ होता है। सत्य बोलने से मन शुद्ध और पवित्र बनता है। सत्य का आचरण करने से मन में कोई संघर्ष या डर नहीं रहता। नियमित रूप से विद्या का अभ्यास करने एवं परिश्रम करने से आत्मा की शुद्धि होती है और ज्ञान से बुद्धि निर्मल बनती है। इसलिए मनुष्य को प्रतिदिन स्नान करना चाहिए, सत्य बोलना चाहिए, विद्या का अध्ययन करना चाहिए, परिश्रम करना चाहिए और ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वर्षं तद् भारतं नाम भारती यन्त्र सन्ततिः।।

इस सुबोध वचन में लेखक ने भारत के भौगोलिक स्वरूप का वर्णन किया है। हिन्द महासागर के उत्तर भाग में और हिमालय के दक्षिण भाग में जो क्षेत्र है, उसे भारतवर्ष कहते हैं। वहाँ रहने वाले लोगों को भारतीय कहा जाता है और वे पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ।।

जैसे निरंतर जल की बूंदों के गिरने से खाली घड़ा भी भर जाता है, उसी प्रकार जीवन में भी निरंतर अभ्यास से साधारण मनुष्य भी सभी प्रकार का ज्ञान, धर्म और धन प्राप्त कर सकता है।

यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितानुपाश्रयति ।तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनीदलमिव विस्तारिता बुद्धिः ॥

हमारे आत्म-विकास के लिए श्रेष्ठ व्यक्तियों के साथ संगति और निवास आवश्यक है। जो व्यक्ति निरंतर पढ़ता है, लिखता है, देखता है, अपने संशयों के लिए प्रश्न करता है और ज्ञानी व्यक्तियों की शरण लेता है, उसकी बुद्धि वैसे ही विकसित होती है, जैसे कि सूर्य की किरणों से कमल का पुष्प खिलता है।

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः । तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥

मधुर भाषा से सभी प्राणी, जैसे हमारे सभी मित्र, माता, पिता, भाई आदि प्रसन्न हो जाते हैं। मधुर भाषा बोलने से कोई भी हानि नहीं होती। इसलिए सदा मधुर भाषा ही बोलनी चाहिए। मधुर बोलने में कभी भी झिझक नहीं करनी चाहिए।

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः । नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा चं नावसीदति ॥

आलस हमारे शरीर में स्थित सबसे बड़ा शत्रु है। यह हमारे कार्यों को पूरा करने में सबसे बड़ा बाधक बनता है। वास्तव में परिश्रम ही हमारा सच्चा मित्र है। जो परिश्रम करता है, वह कभी दुखी या असफल नहीं होता।

अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ।।

महर्षि वेदव्यास ने अठारह पुराणों का सार दो वाक्यों में बताया है-दूसरों की णायता करने से पुण्य प्राप्त होता है और दूसरों को कष्ट पहुँचाने से पाप लगता है। इसलिए हमें सदा परोपकार करना चाहिए और कभी भी किसी को कष्ट नहीं देना चाहिए।

प्रश्न 1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु –

(क) नरः कतिभिः वकारैः पूजितः भवति ?

उत्तर पञ्चभिः।

(ख) पुरुषेण कति दोषाः हातव्याः?

उत्तर षड्।

(ग) बुद्धिः केन शुध्यति ?

उत्तर ज्ञानेन।

(घ) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः कः पूर्यते?

उत्तर घटः।

(ङ) आलस्यं केषां महान् रिपुः अस्ति?

उत्तर मनुष्याणां शरीरस्थो

प्रश्न 2. निम्नलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखन्तु –

(क) नरः कथं पूजितो भवति ?

उत्तर नरः पञ्चभि वकारैः पूजितः भवति ।

(ख) पुरुषेण के दोषाः हातव्याः?

उत्तर पुरुषेण षड्दोषाः हातव्याः भवन्ति ।

(ग) कस्य बुद्धिः विस्तारिता भवति ?

उत्तर ज्ञानिजनानाम् बुद्धिः विस्तारिता भवति।

(घ) किं कृत्वा मनुष्यः नावसीदति ?

उत्तर उद्यमं कृत्वा मनुष्यः नावसीदति।

(ङ) व्यासस्य वचनद्वयं किम् ?

उत्तर व्यासस्य वचनद्वयं अस्ति-“परोपकारः पुण्याय तथा परपीडनम् पापाय।”

प्रश्न 4. निम्नलिखितानां वाक्यानां समानार्थकान् श्लोकांशान् पाठात् चित्वा लिखन्तु-

(क) मधुरवाण्या सर्वे प्रसन्नाः भवन्ति ।

उत्तर प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।

(ख) परिश्रमेण तुल्यः बान्धवः नास्ति ।

उत्तर नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।

(ग) परोपकारेण मानवस्य पुण्यार्जनं भवति ।

उत्तर परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।

(घ) हिन्दमहासागरात् हिमालयपर्यन्तं भारतवर्षम्।

उत्तर उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः एव दक्षिणम्। वर्ष तद् भारतं नाम।

प्रश्न 5. अधोलिखितानां शब्दानाम् उदाहरणानुसारं पर्यायपदानि लिखन्तु –

यथा-वपुः     –    शरीरम्

(क) जलम्   – पयः

(ख) लोचनम् – नेत्रम्

(ग) धनम् – संपत्तिः

(घ) बुद्धिः – मतिः

(ङ) रिपुः – शत्रुः

प्रश्न 6. अधः रिक्तस्थानानि तृतीयाविभक्तेः समुचितरूपैः

पूरयन्तु -उत्तरम्-

एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
सुधाखण्डेनसुधाखण्डाभ्याम्सुधाखण्डैः
वृक्षेणवृक्षाभ्याम्वृक्षैः
लतयालताभ्याम्लताभिः
देशेनदेशाभ्याम्देशैः
पुण्येनपुण्याभ्याम्पुण्यैः
विनयेनविनयाभ्याम्विनयैः

प्रश्न 7. कोष्ठके पदानि विलिख्य सुभाषितं पूरयन्तु –

उत्तरम्-उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । 

वर्ष तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। 

तस्मात् तदेव वक्तव्यम् वचने का दरिद्रता।।

प्रश्न 8. उपर्युक्तानि सुभाषितानि पठित्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु –

(क) आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।

(ख) तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता।

(ग) यः पठति लिखति पृच्छति पण्डितानुपाश्रयति 

(घ) स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च। 

(ङ) विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ।

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