Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 7 ईशावास्यम् इदं सर्वम् Hindi & English Translation
NCERT Solutions for Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter ईशावास्यम् इदं सर्वम् Hindi & English Translation सरल भाषा में दिया है। साथ ही Deepakam Class 7 Chapter 7 ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ Question Answer in Hindi के सम्पूर्ण अभ्यास प्रश्नों के उत्तर भी सरल भाषा में लिखे गए हैं। इस पाठ के प्रश्न उत्तर के लिए Class 7 Chapter 7 ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ Hindi anuvad यहां खोले।
संस्कृत वाक्य
(हिरण्यकशिपोः सभा)
राजभट: – अयि भोः सावधानाः तिष्ठन्तु। राजाधिराजः राजगम्भीरः त्रैलोक्याधिपतिः देवाधिदेवः दैत्यराजः हिरण्यकशिपुः आगच्छति।
सभासदः – विजयतां महाराज ! विजयताम्। विजयतां महाराज ! विजयताम्।
हिरण्यकशिपुः – ह ह ह ह…. (अट्टहासेन सह) अहम् एव सर्वशक्तिमान् अस्मि अहम् अमरः अस्मि।
मन्त्री – सत्यं दैत्यराज ! सुराः असुराः यक्ष-गन्धर्व-किन्नराः भवतः सर्वे भीताः तिष्ठन्ति ।
दैत्यपुरोहितः – भगवन् ! देशे सर्वत्र भवतः एव पूजा भवति। अन्यदेवतानाम् पूजाराधनं न भवति। इतः परं यज्ञभागादिकम् अपि देवेभ्यः न केऽपि दास्यन्ति ।
हिन्दी अनुवाद
(हिरण्यकश्यप की सभा)
राजभट – अरे सुनो! सभी लोग सावधान हो जाएँ। खड़े हो जाओ! तीनों लोकों के स्वामी, महान राजा, दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु आ रहे हैं।
सभा के लोग – महाराज की जय हो। वे सदा विजयी रहें। महाराज की जय हो। वे सदा विजयी रहें।
हिरण्यकशिपु – हा हा हा हा….. (जोर से हँसते हुए) मैं ही सबसे शक्तिशाली हूँ। मैं अमर हैं-मुझे कभी मृत्यु नहीं आएगी।
मन्त्री – यह बिल्कुल सच है, हे दैत्यराज। देवता, राक्षस, यक्ष, गंधर्व और किन्नर-सभी आपसे डरते हैं।
दैत्यपुरोहित – हे स्वामी! देश में हर ओर केवल आपकी ही पूजा होती है। अब लोग किसी और देवता की पूजा नहीं करते। अब से देवताओं को यज्ञ का कोई भाग भी नहीं दिया जाएगा।
संस्कृत वाक्य
हिरण्यकशिपुः – साधु साधु। अयि भोः मन्त्रिन् । सर्वत्र जनाः मामेव ध्यायन्ति खलु !
मन्त्री – देव ! सर्वत्र भवतः एव नामकीर्तनं भवति, किन्तु. (अधोमुखः मौनं तिष्ठति ।)
हिरण्यकशिपुः – (सक्रोधम्) आः । जानामि जानामि । भवान् मम पुत्रस्य विषये वक्तुम् इच्छति खलु ।
मन्त्री – (मन्दध्वनिना) सत्यं देव !
हिरण्यकशिपुः – मम पुत्रकः एव मम शत्रुः अस्ति। कुलकलङ्कः सः प्रह्लादः अहर्निशं मम शत्रोः हरेः गुणगानं करोति।
सेनापतिः – स्वामिन् ! गजस्य पद-दलनेन अपि सः जीवति।
हिन्दी अनुवाद
हिरण्यकशिपु – शाबाश, शाबाश! अरे प्रिय मंत्री। सब लोग मेरा ही ध्यान कर रहे हैं न?
मंत्री – हे देव! हर जगह आपका ही नाम लिया जा रहा है, लेकिन……. (चुप हो जाता है और सिर झुकाकर मौन हो जाता है।)
हिरण्यकशिपु – (गुस्से में) आह! मैं जानता हूँ, जानता हूँ। तुम मेरे पुत्र के बारे में कहना चाहते हो, है न?
मन्त्री – (धीरे स्वर में) यह सत्य है, देव!
हिरण्यकशिपु – मेरा अपना पुत्र ही मेरा शत्रु है। वह कुल का कलंक है-वह प्रह्लाद दिन-रात मेरे शत्रु विष्णु का नाम जपता रहता है।
सेनापति – स्वामी! हाथी के पैरों से कुचले जाने पर भी वह जीवित बच जाता है।
संस्कृत वाक्य
हिरण्यकशिपुः – अहो महदाश्चर्यम् !
सेनापतिः – भवदाज्ञया वयम् उत्तुङ्गशिखरात् तं पातितवन्तः। तथापि सः न मृतः ।
मन्त्री – रज्ज्वा बद्ध्वा समुद्रमध्ये क्षिप्तवन्तः । तथापि…..
हिरण्यकशिपुः– (हस्तौ मर्दयन् सक्रोधम्) आः… किं करवाणि, किं करवाणि एतस्य । (किञ्चिद् विचिन्त्य) आस्तां तावत्। उपायः मया चिन्तितः । द्रक्ष्यामि सः कथं जीविष्यति इति। (वदन् सभातः निर्गतः ।)
(सर्वे निष्क्रान्ताः)
हिन्दी अनुवाद
हिरण्यकशिपु – अरे। यह तो बहुत बड़ा आश्चर्य है।
सेनापति – आपकी आज्ञा से हमने उसे ऊँचे पर्वत की चोटी से गिरा दिया, फिर भी वह मरा नहीं।
मन्त्री – हमने उसे रस्सियों से बाँधकर समुद्र के बीच में फेंक दिया, फिर भी…….
हिरण्यकशिपु – (क्रोध से दोनों हाथ मसलते हुए) आह! अब इसके साथ मैं क्या करूँ, क्या करूँ? (थोड़ा सोचकर) ठीक है, अब रहने दो। मैंने एक उपाय सोच लिया है। अब देखूँगा कि वह कैसे जीवित बचता है।
(ऐसा कहते हुए सभा से बाहर चला जाता है।)
संस्कृत वाक्य
हिरण्यकशिपुः – अयि भोः अनुजे! होलिके !! होलिके !!! कुत्र असि त्वम् ? इत इतः ।
होलिका – प्रणमामि भ्रातः ! कथं मां स्मरसि ? किमर्थं दुःखितः भासि ? किं कारणम् अस्य दुःखस्य ? वद भ्रातः । वद।
हिरण्यकशिपुः – अनुजे ! त्वं जानासि एव, मम पुत्रः एवं मम शत्रुः जातः । (क्षीणस्वरेण सर्वं वृत्तान्तं कथयति)
होलिका – भ्रातः ! अलं चिन्तया, ब्रह्मणः वरप्रसादात् अग्निः मां न दहति, अहं ज्वालयिष्यामि प्रह्लादम्। आश्वस्तो भव।
हिन्दी अनुवाद
सभी दरबार से बाहर चले जाते हैं।
हिरण्यकशिपु – अरे ओ बहन होलिका। कहाँ हो तुम? इधर आओ इथर।
होलिका – भैया। आपको प्रणाम। आपने मुझे कैसे याद किया? आप इतने दुखी क्यों लग रहे हैं?इस दुख का कारण क्या है? बताइए भैया, बताइए।
हिरण्यकशिपु – बहन। तुम जानती ही हो, मेरा अपना बेटा ही अब मेरा दुश्मन बन गया है। (कमजोर आवाज में यह सारा हाल बताता है)
होलिका – भैया। आप चिन्ता न करें। मुझे ब्रह्माजी से वरदान मिला है कि अग्नि मुझे नहीं जलाएगी। मैं प्रह्लाद को आग में बैठाकर जला दूँगी। आप निश्चिन्त रहिए।
संस्कृत वाक्य
(होलिका प्रह्लादकक्षं प्रविशति)
प्रह्लादः – (होलिकां दृष्ट्वा) पितृष्वसः ! (आलिङ्गति)
होलिका – अयि भोः प्रह्लाद ! आगच्छ, आवां क्रीडिष्यावः।
प्रह्लादः – (सहर्षम्) बाढम् ।
होलिका – प्रथमं त्वं माम् अन्विष्यसि ।
प्रह्लादः – (सहर्षम्) साधु।
(होलिका प्रह्लादस्य नेत्रयोः पट्टिकां बध्नाति। किञ्चित् दूरे अग्निं प्रज्वालयति। स्वयम् अग्नौ उपविश्य करतलध्वनिना आह्वयति ।)
होलिका – अत्र, अहम् अत्र अस्मि, इत इतः।
प्रह्लादः – अहो तापम् अनुभवामि खलु अहम् । (प्रह्लादः अग्निकुण्डस्य समीपम् गच्छति। होलिका तम् अङ्के स्वीकरोति
हिन्दी अनुवाद
होलिका प्रह्लाद के कमरे में प्रवेश करती है)
प्रह्लाद – (होलिका को देखकर) हे बुआ! (उसे आलिंगन करता है)
होलिका – अरे प्रह्लाद! आओ, हम दोनों खेलेंगे।
प्रह्लाद – (खुशी के साथ) हाँ, अवश्य।
होलिका – पहले तुम मुझे ढूँढ़ोगे।
प्रह्लाद – (मुस्कुराकर) ठीक है।
होलिका – (होलिका प्रह्मद की आँखों पर पट्टी बाँध देती है। फिर वह थोड़ा दूर जाकर अग्नि जलाती है और स्वयं अग्नि में बैठ जाती है। हाथ की ताली बजाकर प्रह्लाद को बुलाती है।)
होलिका – मैं यहाँ हूँ, मैं यहाँ हूँ-इस ओर, इस ओर।
प्रह्लाद – अरे! मुझे तो गर्मी का अनुभव हो रहा है। (प्रह्लाद अग्निकुंड के पास पहुँचता है। होलिका उसे अपनी गोद में बिठा लेती है।)
संस्कृत वाक्य
होलिका – ह…..ह….ह… प्रह्लाद ! अहं तव मृत्युः अस्मि । अहं त्वाम् अग्नये दास्यामि।
प्रह्लादः – (करौ बद्ध्वा हरि स्मरति)
ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय…. (नारायणस्य कृपया प्रह्लादः रक्षितः भवति। ब्रह्मणः वरस्य दुरुपयोगकारणात् अग्निः होलिकाम् एव ज्वालयति। होलिका अग्निदाहात् आर्तनादं कुर्वती प्राणान् त्यजति ।)
हिन्दी अनुवाद
होलिका – हा… हा… हा… प्रह्लाद! मैं ही तुम्हारी मृत्यु हूँ। मैं तुम्हें अग्नि को अर्पण कर दूँगी।
प्रह्लाद – (हाथों को जोड़कर श्रीहरि को स्मरण करता है)ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय…
(नारायण की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहता है। ब्रह्माजी के वरदान का दुरुपयोग करने के कारण अग्नि केवल होलिका को ही जलाती है। होलिका जलने के कष्ट से चीत्कार करते हुए प्राण त्याग देती है।)
संस्कृत वाक्य
दैत्याः – अहो ! किमेतत् ? होलिका एव दग्धा। (ततः प्रविशति प्रह्लादः हिरण्यकशिपुः च)
प्रह्लादः – ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय…
हिरण्यकशिपुः – (सक्रोधं दन्तान् विघट्टयन्) आः, नारायण ! नारायण ! दर्शय, कुत्र अस्ति तव नारायणः ?
प्रह्लादः – तात ! श्रीहरिः तु सर्वत्र अस्ति।
हिरण्यकशिपुः – किं ते हरिः अत्र अस्ति? तत्र अस्ति ? सोपानेषु अस्ति? अथवा अस्मिन् स्तम्भे अस्ति ?
प्रह्लादः – नूनं हरिः सर्वत्र अस्ति। अस्मिन् स्तम्भे अपि अस्ति।
हिरण्यकशिपुः – आः, मूढ ! पश्य पश्य, अनेन खड्गेन स्तम्भं भक्ष्यामि।
प्रह्लादः – ॐ तुमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय…(हिरण्यकशिपुः स्तम्भं प्रहरति । महता गर्जनेन नृसिंहः स्तम्भात् बहिः आगच्छति)
हिन्दी अनुवाद
दैत्यगण – अरे! यह क्या हो गया? होलिका ही जल गई!(तभी प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु मंच पर प्रवेश करते हैं)
प्रह्लाद – (भगवान को स्मरण करते हुए) ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय…
हिरण्यकशिपु – (गुस्से से, दाँत पीसते हुए) नारायण ! नारायण। बता, कहाँ है तेरा नारायण?
प्रह्लाद – पिताजी! श्रीहरि (भगवान नारायण) तो सर्वत्र (हर जगह) हैं।
हिरण्यकशिपु – क्या तेरा हरि यहाँ है? वहाँ है? सीढ़ियों में है? या फिर इस खंभे में है?
प्रह्लाद – निश्चय ही हरि तो हर जगह हैं। इस खंभे में भी हैं।
हिरण्यकशिपु – अरे मूर्ख। देख, देख। मैं इस तलवार से खंभे को तोड़ता हूँ।
प्रह्लाद – ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय…(हिरण्यकशिपु खंभे पर प्रहार करता है। जोर की गर्जना के साथ खंभे से भगवान नृसिंह प्रकट होते हैं।)
संस्कृत वाक्य
नृसिंहः – (क्रोधेन सिंहगर्जनं कुर्वन्) रे पापात्मन् ! अद्य तव मृत्युः सन्निहितः । कालोऽहं तव ।
हिरण्यकशिपुः– (आदौ आश्चर्येण पश्यति पुनः कथयति) आः, असत्यवादिन् ! अहं ब्रह्मदेवात् वर प्राप्य अमरः अस्मि । त्वाम् एव मृत्युलोकं प्रेषयिष्यामि । (तस्मिन् सन्ध्याकाले नृसिंहः हिरण्यकशिपुं केशेषु गृहीत्वा कर्षति)
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नृसिंहः – रे मूर्ख ! अधम ! त्वं ब्रह्मदेवात् वरं प्राप्तवान् असि, तं वरम् अनुल्लङ्घय अहं त्वां मारयिष्यामि।
(राजभवनस्य अन्तः बहिः च एतयोः मध्ये विद्यमानायां देहल्यां तं गृह्णाति) मूढ ! पश्य, न त्वमसि भुवि, न च स्वर्गे; न वा पाताले, न च आकाशे; न गृहाभ्यन्तरे, बहिर्भागे वा; नायं दिवसो, न वा रात्रिः; नाहं मनुष्यो, न च पशुः; न अस्त्रेण, न च शस्त्रेण; निजनखैः तव वक्षःस्थलं विदीर्य हनिष्यामि।
हिन्दी अनुवाद
नृसिंह – (क्रोधपूर्वक सिंहगर्जना करते हुए) हे पापी। आज ही तेरी मृत्यु निश्चित है। मैं ही तेरा काल हूँ।
हिरण्यकशिपु -(पहले आश्चर्य से देखता है, फिर बोलता है) अरे, झूठ बोलने वाले! मैं ब्रह्मा से वर पाकर अमर हो गया हूँ। मैं ही तुझे मृत्यु लोक भेज दूँगा। (संध्या के समय, नृसिंह हिरण्यकशिपु के बाल पकड़कर उसे खींचते हैं)
नृसिंह – हे मूर्ख ! हे अधम ! तूने ब्रह्मा से जो वर पाया है, मैं उसे तोड़े बिना तुझे मार डालूँगा। (उसे महल के अंदर और बाहर इन दोनों के बीच की दहलीज में ले जाते हैं) मूर्ख ! देख, न तू आकाश में है, न पाताल में। न दिन है, न रात्रि। न तू घर के भीतर है, न बाहर। न मैं मनुष्य हूँ, न पशु। न मैं शस्त्र से मार रहा हूँ, न अस्त्र से। मैं अपने नखों से तेरे वक्षस्थल को चीर दूँगा और तुझे मार डालूँगा।
संस्कृत वाक्य
हिरण्यकशिपुः – (भीतः) प्रभो ! क्षमस्व मां, क्षमस्व ।
नृसिंहः – अधम ! न तेऽपराधः क्षम्यः । (सिंहगर्जनं कुर्वन् हिरण्यकशिपोः वक्षःस्थलं भिनत्ति।)
अध्यापिका – एवं बालः प्रह्लादः ईश्वरः सर्वत्र अस्ति इति दर्शितवान् । अत एव उच्यते, ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ इति।
हिन्दी अनुवाद
हिरण्यकशिपु – (डरकर) हे प्रभु! मुझे क्षमा कीजिए, मुझे क्षमा कीजिए।
नृसिंह – (क्रोधित होकर) दुष्ट! तेरा अपराध क्षमा करने योग्य नहीं है। (नृसिंह सिंह की तरह गर्जना करते हैं और हिरण्यकशिपु की छाती फाड़ देते हैं।)
अध्यापिका – (छात्रों से कहती हैं), इस प्रकार बालक प्रह्लाद ने यह सिद्ध कर दिया कि ईश्वर हर जगह होते हैं। इसलिए कहा गया है- ‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’ अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है।
Deepakam Class 7 Chapter 7 ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ Question Answer in Hindi
प्रश्न 1. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तराणि लिखन्तु –
(क) दैत्यराजः कः?
उत्तर हिरण्यकशिपुः।
(ख) के हिरण्यकशिपुं ध्यायन्ति ?
उत्तर जनाः।
(ग) किं देवेभ्यः न दास्यन्ति?
उत्तर यज्ञभागादिकम्।
(घ) कस्य दलनेन अपि सः जीवति ?
उत्तर गजस्य।
(ङ) राक्षसाः कुतः प्रह्लादं पातितवन्तः?
उत्तर उत्तुङ्गशिखरात्।
(च) हिरण्यकशिपुः कस्मात् वरं प्राप्तवान्?
उत्तर ब्रह्मदेवात्।
(छ) हरिः कुत्र अस्ति इति कः वदति ?’
उत्तर हिरण्यकशिपुः।
प्रश्न 2. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखन्तु –
(क) के भीताः तिष्ठन्ति ?
उत्तर सुराः, असुराः, यक्ष-गन्धर्व-किन्नराः सर्वे हिरण्यकशिपोः भीताः तिष्ठन्ति ।
(ख) प्रह्लादः अहर्निशं किं करोति ?
उत्तर प्रह्लादः अहर्निशं नारायणस्य नाम स्मरणं करोति ।
(ग) प्रह्लादं कथं समुद्रे क्षिप्तवन्तः?
उत्तर राक्षसाः प्रह्लादं समुद्रे क्षिप्तवन्तः ।
(घ) नृसिंहः कथं बहिः आगच्छति?
उत्तर नृसिंहः स्तम्भं भित्वा बहिः आगच्छति ।
(ङ) हिरण्यकशिपुः केन स्तम्भं भक्ष्यामि इति वदति?
उत्तर हिरण्यकशिपुः खड्गेन स्तम्भं भक्ष्यामि इति वदति।
प्रश्न 3. उदाहरणानुसारं रिक्तस्थानानि पूरयन्तु –
| (क) रामेण | रामाभ्याम् | रामैः |
| (ख) चमसेन | चमस्याभ्याम् | चमसैः |
| (ग) आचार्येण | आचार्याभ्याम् | आचार्ये |
| (घ) आसन्देन | आसन्दाभ्याम् | आसन्दै |
| (ङ) बालिकया | बालिकाभ्याम् | बालिक |
| (च) पेटिकया | पेटिकाभ्याम् | पेटिकाभिः |
| (छ) मित्रेण | मित्राभ्याम् | मित्रैः |
| (ज) वस्त्रेण | वस्त्राभ्याम् | वस्त्रैः |
प्रश्न 4. उदाहरणानुसारं रेखाङ्ङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु
उत्तराणि-(क) कः आगच्छति?
(ख) के सर्वे भीताः भविष्यन्ति?
(ग) दैत्यराजः केन खड्गेन प्रहरति ?
(घ) अहं कं मारयिष्यामि ?
(ङ) तातः हरिस्तु कुत्र अस्ति?
(च) कस्य विषये वक्तुम् इच्छति?
(छ) नरसिंहः कैः हिरण्यकशिपुं मारितवान्?
प्रश्न 5. अधः प्रदत्तेषु रिक्तस्थानेषु तृतीया-विभक्त्यन्तानि रूपाणि लिखन्तु-
(क) अहं मम खड्गेन(खड्ग) स्तम्भं भक्ष्यामि ।
(ख) प्रह्लादः गजस्य पददलेन (पददलन) अपि जीवति ।
(ग) सर्वे जनाः नारायणेन (नारायण) अनुगृहीताः ।
(घ) निजनखैः (निजनख) तव वक्षःस्थलं विदीर्य मारयिष्यामि ।
(ङ) बालिकाः शिक्षिकया (शिक्षिका) सह चर्चा कुर्वन्ति ।
प्रश्न 6. उदाहरणानुसारं संयोज्य लिखन्तु –
(क) रमा + ईशः= रमेशः
(ख) सुर + ईश्वरः = सुरेश्वर:
(ग) नाग + इन्द्रः = नागेन्द्र:
(घ) गज + इन्द्रः = गजेन्द्र:
(ङ) माता + इव = मातेव
(च) राम + इति = रामेति
(छ) पर + उपकारः = परोपकार:
(ज) मम + उपरि = ममोपरि
(झ) सूर्य + उदयः = सूर्योदय:
(ञ) रामेण + उक्तम् = रामेणोक्तम्
(ट) तस्य + उपरि = तस्योपरि
प्रश्न 7. उदाहरणानुसारं वाक्यानि वर्तमानकालतः भविष्यत्-काले परिवर्तयन्तु –
उत्तराणि (क) सां आपणं गमिष्यति ।
(ख) रमा क्रीडाङ्गणे क्रीडिष्यति ।
(ग) बालाः फलानि खादिष्यन्ति ।
(घ) ताः योगासनं करिष्यन्ति ।
(ङ) अहं नित्यं पठिष्यामि ।
(च) त्वं कस्मिन् विषये वदिष्यसि ?
(छ) आवां पाठं लेखिष्यावः।
(ज) यूयं शालां गमिष्यथ ।
(झ) ते बालिके वैद्ये भविष्यतः।
(ञ) वयं श्लोकान् स्मरिष्यामः ।
