Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 8 हितं मनोहारि च दुर्लभं वच: Questions and Answers
NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter हितं मनोहारि च दुर्लभं वच: Hindi & English Translation सरल भाषा में दिया है। साथ ही Deepakam Class 7 Chapter 8 हितं मनोहारि च दुर्लभं वच: Question Answer in Hindi के सम्पूर्ण अभ्यास प्रश्नों के उत्तर भी सरल भाषा में लिखे गए हैं। इस पाठ के प्रश्न उत्तर के लिए Class 7 Chapter 8 हितं मनोहारि च दुर्लभं वच: Hindi anuvad यहां खोले।
संस्कृत सूक्त्य
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ॥१॥
हिन्दी अनुवाद
पृथ्वी हमारी माता के समान हमें पालती पोसती है, हमारी रक्षा करती है और हमें जीवन के लए आवश्यक सब कुछ प्रदान करती है। इसलिए भूमि हम सभी की माता है। हम सभी इस पृथ्वी की संतान हैं। ह धरती सदैव पूजनीय है, क्योंकि यह हमारे जीवन का आधार है।
English Translation
The Earth nurtures and protects us like a mother, providing everything essential for life. Therefore, the land is the mother of us all. We are all children of this Earth. This Earth is forever worthy of reverence, for it is the foundation of our lives.
संस्कृत सूक्त्य
न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत् ।।२।।
हिन्दी अनुवाद
हीरा आदि रत्न स्वयं ग्राहक की खोज नहीं करते, बल्कि ग्राहक ही रत्नों को ढूँढ़ते हैं। उसी प्रकार, यदि हमारे अंदर गुण (अच्छे स्वभाव, योग्यता, ज्ञान आदि) होंगे, तो गुणों को पहचानने वाले विद्वान या ज्ञानो व्यक्ति स्वयं हमें खोजते हुए हमारे पास आ जाएंगे
English Translation
Gemstones like diamonds do not go in search of customers; rather, it is the customers who seek them out. Similarly, if we possess virtues—such as a good nature, competence, and knowledge—then wise or knowledgeable individuals capable of recognizing these qualities will themselves come looking for us.
संस्कृत सूक्त्य
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ॥३॥
हिन्दी अनुवाद
शरीर वास्तव में धर्म (कर्तव्य) का पहला साधन है। यदि हमारा शरीर स्वस्थ होता है, तभी हम अपने कर्तव्य का पालन ठीक प्रकार से कर सकते हैं। इसलिए हमें अपने शरीर की रक्षा और देखभाल अवश्य करनी चाहिए, क्योंकि शरीर ही धर्म (कर्तव्य पालन) का पहला और मुख्य साघन है।
English Translation
The body is truly the primary instrument for fulfilling Dharma (duty). Only when our body is healthy can we properly discharge our duties. Therefore, we must protect and care for our body, as it is the first and foremost means of fulfilling Dharma.
संस्कृत सूक्त्य
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थ च साधयेत् ।।४।।
हिन्दी अनुवाद
ज्ञान प्राप्त करने के लिए निरंतर अभ्यास और समय का उपयोग करना आवश्यक है। एक क्षण का भी अपव्यय नहीं करना चाहिए, क्योंकि समय बहुत मूल्यवान है। उसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति धन (संपत्ति) एकत्र करना चाहता है, तो उसे भी थोड़ा-थोड़ा करके रुपयों का संग्रह करते रहना चाहिए। श्लोक के अंत में कहा गया है-“क्षणत्यागे कुतो विद्या, कणत्यागे कुतो धनम्।”
English Translation
Acquiring knowledge requires constant practice and the proper utilization of time. Not even a single moment should be wasted, for time is extremely valuable. Similarly, if a person wishes to accumulate wealth, they must gather money bit by bit. The verse concludes with the saying: “Without sacrificing moments, how can one gain knowledge? Without saving grains, how can one amass wealth?”
संस्कृत सूक्त्य
सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ॥५॥
हिन्दी अनुवाद
जो व्यक्ति सदैव सुख चाहता है, परिश्रम नहीं करता और आलसी होता है, वह ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकता है? इसलिए, जो व्यक्ति वास्तव में ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसे चाहिए कि वह आलस्य और सुख को त्याग दे और निरंतर अध्ययन करता रहे।
English Translation
How can a person who constantly seeks comfort, avoids hard work, and is lazy acquire knowledge? Therefore, one who truly desires to gain knowledge must renounce laziness and the pursuit of comfort, and engage in continuous study.
संस्कृत सूक्त्य
गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्ग न च वयः ।।६।।
हिन्दी अनुवाद
गुणवान व्यक्ति ही सम्मान के योग्य होते हैं। किसी का लिंग (स्त्री या पुरुष) या उम्र (आय) नहीं बल्कि उसके गण ही सम्मान के कारण होते हैं।
English Translation
Only virtuous individuals are worthy of respect. It is one’s qualities—not gender (male or female) or age—that command respect.
संस्कृत सूक्त्य
मा ब्रूहि दीनं वचः ॥७॥
हिन्दी अनुवाद
समाज में हर प्रकार के लोग होते हैं-कुछ लोग सच में सहायता करते हैं और कुछ केवल बड़े-बड़े वचन बोलते हैं या दिखावा करते हैं। ऐसे में एक स्वाभिमानी व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी भी व्यक्ति से गिड़गिड़ाकर सहायता न मांगे। उसे अपने आत्मसम्मान को बनाए रखते हुए स्वावलंबी बनने का प्रयास करना चाहिए।
English Translation
Society comprises all kinds of people—some genuinely offer help, while others merely make grand promises or put on a show. In such a situation, a self-respecting individual should avoid begging anyone for assistance; instead, they should strive to become self-reliant while upholding their self-respect.
संस्कृत सूक्त्य
यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ॥८॥
हिन्दी अनुवाद
जो ज्ञान अर्जित किया गया है, वह तभी सार्थक होता है जब उसे जीवन में आचरण और व्यवहार में लाया जाए। मनुष्य केवल पढ़ लेने से ही विद्वान् नहीं बनता, बल्कि जब वह उस ज्ञान के अनुसार कर्म करता है, तब ही वह वास्तव में विद्वान् कहलाता है। विद्या यदि अच्छे कर्मों के साथ न जुड़ी हो, तो वह व्यर्थ है। ऐसा ज्ञान जो उपयोग में नहीं लाया गया हो, वह केवल बोझ बनकर रह जाता है। इसलिए कहा गया है- “ज्ञानं भारः क्रियां विना”, अर्थात् कर्म के बिना ज्ञान केवल बोझ है।
English Translation
Acquired knowledge becomes meaningful only when it is put into practice in one’s life and conduct. A person does not become learned merely by reading; one is truly considered learned only when one acts in accordance with that knowledge. Knowledge is futile if it is not coupled with good deeds. Knowledge that is not put to use merely becomes a burden. Hence the saying: “Jnanam bharah kriyam vina”—meaning, knowledge without action is merely a burden.
संस्कृत सूक्त्य
शीलं परं भूषणम् ॥९॥
हिन्दी अनुवाद
मनुष्य का श्रेष्ठ आचरण ही उसका सबसे बड़ा आभूषण (गहना) होता है। यदि किसी व्यक्ति में सज्जनता, नम्रता, सच्चरित्रता जैसे गुण नहीं हैं, तो उसके अन्य गुण (जैसे-रूप, विद्या, धन) भी व्यर्थ हो जाते हैं। सदाचार के बिना अन्य सब विशेषताएँ निरर्थक हैं।
English Translation
A person’s noble conduct is their greatest ornament. If an individual lacks qualities such as decency, humility, and good character, then their other attributes—such as physical beauty, education, and wealth—become meaningless. Without virtuous conduct, all other qualities are of no avail.
संस्कृत सूक्त्य
हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ।।१०।।
हिन्दी अनुवाद
कुछ लोग तो हित की बात कहते हैं, लेकिन कठोरता से, जिससे सुनने में अच्छा नहीं लगता। कुछ लोग मीठे और आकर्षक शब्द कहते हैं, पर वे हितकारी नहीं होते। ऐसे वचन जो साथ ही हितकारी भी हों और सुनने में मनोहर भी, अत्यन्त दुर्लभ होते हैं
English Translation
Some people speak words that are beneficial but harsh, making them unpleasant to hear. Others use sweet and charming words, yet these are not truly beneficial. Words that are both beneficial and pleasing to the ear are exceedingly rare.
प्रश्न 1. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ‘आम्’ अथवा ‘न’ इति वदन्तु लिखन्तु च-
(क) किं वयं पृथिव्याः पुत्राः पुत्र्यः च स्मः?
उत्तर आम्।
(ख) किं रत्नम् अन्विष्यति ?
उत्तर न।
(ग) किं शीलं श्रेष्ठम् आभूषणम् अस्ति ?
उत्तर आम्।
(घ) किं शरीरम् आद्यं धर्मसाधनम् ?
उत्तर आम्।
(ङ) किं गुणानां सर्वदा एव आदरः भवति ?
उत्तर आम्।
(च) किं क्रियाशीलः एव विद्वान् भवति ?
उत्तर आम्।
(छ) किम् अस्माभिः केवलं मनोरञ्जकानि वाक्यानि वक्तव्यानि ?
उत्तर न।
(ज) यः सदा सुखम् इच्छति, किं सः विद्यां प्राप्नोति ?
उत्तर न।
प्रश्न 2. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु-
(क) आद्यं धर्मसाधनं किम् ?
उत्तर शरीरम्।
(ख) कीदृशं वचः मा ब्रूहि?
उत्तर दीनम्।
(ग) श्रेष्ठम् आभूषणं किम् अस्ति ?
उत्तर शीलम्।
(घ) सर्वेषां मनुष्याणां माता का अस्ति?
उत्तर पृथिवी।
(ङ) रत्नानाम् अन्वेषणं के कुर्वन्ति ?
उत्तर ग्राहकाः।
प्रश्न 3. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखन्तु-
(क) कः विद्वान् अस्ति ?
उत्तर क्रियावान् पुरुषः विद्वान् अस्ति ।
(ख) गुणिषु पूजास्थानं किम् ?
उत्तर गुणिषु पूजास्थानं गुणाः भवन्ति ।
(ग) कः विद्यां न प्राप्नोति ?
उत्तर सुखार्थी विद्यां न प्राप्नोति ।
(घ) मनुष्यः विद्याम् अर्थं च कथं साधयेत्?
उत्तर मनुष्यः क्षणशः कणशश्च विद्याम् अर्थं च साधयेत् ।
(ङ) कीदृशं वचनं दुर्लभम् ?
उत्तर हितं मनोहारि च वचनं दुर्लभम् ।
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प्रश्न 4. रेखाङ्ङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्मा कुर्वन्तु –
(क) शीलं परं भूषणम् ।
(ख) मनुष्यः पृथिव्याः सन्तानः अस्ति ।
(ग) गुणिषु लिङ्ग वयः च न महत्त्वपूर्णम् ।
(घ) हितकारकं मनोहारि च वचः दुर्लभं भवति।
उत्तराणि (क) किं परम् भूषणम् ?
(ख) मनुष्यः कस्याः सन्तानः अस्ति?
(ग) केषु लिङ्ग वयः च न महत्त्वपूर्णम् ?
(घ) हितकारकं मनोहारि च किम् दुर्लभं भवति ?
प्रश्न 5. पाठस्य आधारेण उदाहरणानुसारं समुच्चि मेलनं कुर्वन्तु –
उत्तराणि-
(क) क्षणशः कणशः साधयेत् – विद्याम् अर्थं च
(ख) सर्वश्रेष्ठम् आभूषणम्- शीलम्
(ग) रत्नं न अन्विष्यति, तत् – मृग्यते
(घ) आद्यं धर्मसाधनम् – शरीरम्
(ङ) हितकारकं मनोहारि च वचः – दुर्लभम्
(च) पूजास्थानम्-गुणाः
प्रश्न 6. पाठात् अधोलिखितानां पदानां समानार्थकपट चित्वा लिखन्तु –
(क) सुतः – पुत्रः
(ख) प्रथमम् – आद्यम्
(ग) धनम् – अर्थम्
(घ) अवस्था – वयः
(ङ) वचनम् – वचः
(च) आचरणम् – शीलम्
प्रश्न. 7. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितेषु वाक्येषु रेखाङ्ङ्कितपदानां विभक्तिं निर्दिशन्तु –
(क) माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ।
उत्तर षष्ठी विभक्तिः
(ख) गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्ग न च वयः।
उत्तर सप्तमी विभक्तिः।
(ग) शीलं परं भूषणम् ।
उत्तर प्रथमा विभक्तिः।
(घ) क्षणशः कणशश्चैव विद्याम् अर्थं च साधयेत्।
उत्तर द्वितीया विभक्तिः।
(ङ) सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्।
उत्तर षष्ठी विभक्तिः।
(च) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।
उत्तर प्रथमा विभक्तिः।
प्रश्न 8. यत्र अग्रे स्वरः अस्ति तत्र अनुस्वारस्य स्थाने ‘म्’ लिखित्वा वाक्यानि पुनः लिखन्तु –
(क) न रत्नं अन्विष्यति ।
उत्तर न रत्नम् अन्विष्यति ।
(ख) शरीरं आद्यं खलु धर्मसाधनम् ।
उत्तर शरीरम् आद्यं खलु धर्मसाधनम् ।
(ग) वयं अद्यतनं पाठं पठामः।
उत्तर वयम् अद्यतनं पाठं पठामः।
(घ) त्वं अस्माकं गृहं आगच्छ।
उत्तर त्वम् अस्माकं गृहम् आगच्छ।
(ङ) अहं एकं प्रश्नं प्रष्टुं इच्छामि ।
उत्तर अहम् एकम् प्रश्नं प्रष्टुम् इच्छामि ।
(च) गुणं अर्जयितुं अधिकं प्रयत्नं करोतु ।
उत्तर गुणम् अर्जयितुम् अधिकं प्रयत्नं करोतु ।

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