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Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 12 वीराङ्गना पन्नाधाया Hindi Translation | NCERT Solutions

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Deepakam Class 7 Chapter 12 Virangana Pannadhaya Hindi Translation

इस पोस्ट में हमने Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 12 वीराङ्गना पन्नाधाया Hindi Translation सरल भाषा में दिया है। साथ ही Deepakam Class 7 Chapter 12 Virangana Pannadhaya Hindi Translation के सम्पूर्ण अभ्यास प्रश्नों के उत्तर भी सरल भाषा में लिखे गए हैं। इस पाठ के प्रश्न उत्तर के लिए Class 7 Chapter 12 Virangana Pannadhaya Question Answer यहां खोले।

NCERT Solutins For Class 7 Sanskrit Deepakam All Chapaters

Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 12 Virangana Pannadhaya
Class 7 Sanskrit Deepakam Chapter 12 Virangana Pannadhaya

एषा भारतभूमिः वीराणां त्यागधनानां भूमिः अस्ति। सर्वे भारतीयाः ‘एषा भूमिः अस्माकं माता’ इति वदन्ति। अथर्ववेदे ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ इति उक्तम्। मातृभूमेः रक्षणार्थं भारतीयाः सर्वस्वम् अर्पितवन्तः । एतादृशानां भारतीयानां गणनायां महिलानां प्रभूतं योगदानम् अस्ति। त्यागे वीरतायां च महिलाः शत्रुनिबर्हणाः आसन्। एतादृशीषु वीरा‌ङ्गनासु राजस्थानस्य पन्नाधाया काचिद् ‌विशिष्टा वीराङ्गना आसीत् । एषा साहसस्य त्यागस्य निष्ठायाः च अद्वितीया मूर्तिः आसीत्। अस्मिन् पाठे तस्याः त्यागस्य पराक्रमस्य च वर्णनं कृतम्। एषा इतिहासस्य स्वर्णिमाक्षरैः लिखिता घटना अस्ति ।

हिन्दी सरलार्थ:- यह भारतभूमि वीरों के त्याग की मूर्तियों की भूमि है। भारत में रहने वाले सभी लोग इसे ‘हमारी माता’ कहते हैं। अथर्ववेद में कहा गया है — “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” अर्थात् भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।

मातृभूमि की रक्षा के लिए सभी भारतीयों ने अपना सर्वस्व अर्पण किया है। ऐसे भारतीयों की गिनती में महिलाओं का योगदान भी अत्यधिक है। त्याग और वीरता में महिलाएँ शत्रुओं की विनाशक रही हैं। इन वीरांगनाओं में राजस्थान की पन्नाधाय एक विशेष वीर-नारी थीं।

वे साहस, त्याग और कर्तव्यपरायणता की अनुपम प्रतिमूर्ति थीं। इस पाठ में उनके त्याग और पराक्रम का वर्णन किया गया है। यह घटना इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखी गई है।

षोडशे शतके मेवाडनगरे महाराणा-सङ्ग्रामसिंहः इति सुविख्यातः महाराजः आसीत्। तस्य द्वौ पुत्रौ विक्रमादित्यः उदयसिंहः च आस्ताम्। महाराणासङ्ग्रामसिंहस्य भ्राता पृथ्वीराजः । बनवीरः पृथ्वीराजस्य अष्टादशसु पुत्रेषु अन्यतमः ।

हिन्दी सरलार्थ:- सोलहवीं शताब्दी में मेवाड़ में महाराणा संग्राम सिंह (महाराणा सांगा) बहुत ही प्रसिद्ध महाराजा थे। उनके दो पुत्र – विक्रमादित्य और उदयसिंह थे। महाराणा संग्राम सिंह के भाई पृथ्वीराज थे। बनवीर पृथ्वीराज के औरस पुत्रों में से एक था।

सः बनवीरः महाराणासङ्ग्रामसिंहस्य प्रथमं पुत्रं विक्रमादित्यं छलेन मारयित्वा मेवाडस्य शासनम् अकरोत्। ततः परमपि सः दुष्टबुद्धिः अचिन्तयत् यत् – “अहम् एकः एव उत्तराधिकारी भवेयम्। न कोऽपि मम प्रतिस्पर्धी स्यात्” इति।

हिन्दी सरलार्थ:-उस बनवीर ने महाराणा संग्राम सिंह के ज्येष्ठ पुत्र विक्रमादित्य को कपट से मारकर मेवाड़ के शासन पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् उस दुष्ट बुद्धि वाले ने सोचा — “मैं ही एकमात्र उत्तराधिकारी रहूँ, मेरा कोई भी प्रतिद्वन्द्वी न रहे।”

अतः कदाचित् रात्रौ सः उदयसिंहं मारयितुं कुतन्त्रम् अरचयत्। तद् ज्ञात्वा पन्नाधाया उदयसिंहस्य शयनस्थाने स्वपुत्रं चन्दनं शायितवती। सा तस्य दुष्परिणामं जानाति स्म। बनवीरः उदयसिंहस्य शयनागारम् आगच्छत्। तत्र सुप्तः चन्दनः एव उदयसिंहः इति मत्वा बनवीरः चन्दनम् अमारयत् ।

हिन्दी सरलार्थ:– इसलिए एक रात उसने उदयसिंह को मारने का षड्यन्त्र रचा। यह जानकर पन्नाधाय ने उदयसिंह के शयन-स्थान (शय्या) पर अपने पुत्र चन्दन को सुला दिया। वह इसके दुष्परिणाम को जानती थीं। बनवीर उदयसिंह के शयन-कक्ष में आया। वहाँ सोए हुए चन्दन को ही उदयसिंह समझकर बनवीर ने चन्दन का वध कर दिया।

पन्नाधायायाः निर्णयः अकल्पनीयः आसीत्। ‘व्यक्तिहितंन, राष्ट्रहितम् एव श्रेष्ठम्’ इति सा जानाति स्म । तस्याः पुत्रस्तु दिवङ्गतः, परं सा मेवाडराज्यं बनवीरस्य कुतन्त्रात् अरक्षत् ।

कालान्तरे सः एव उदयसिंहः युद्धे बनवीरं हत्वा मेवाडराज्यस्य राजा अभवत्। तस्य पुत्रः एव पराक्रमी योद्धा महाराणाप्रतापः । सः प्रतापः शौर्येण भारतीयानां हृदये चिरं स्थानं प्राप्नोत् ।

कथ्यते एव – “यदि पन्नाधाया स्वपुत्रस्य बलिदानं न अकरिष्यत् तर्हि उदयसिंहः न अभविष्यत्। यदि उदयसिंहः न अभविष्यत् तर्हि महाराणाप्रतापः अपि न अभविष्यत्” ।

हिन्दी सरलार्थ:- पन्नाधाय का निर्णय सामान्य विचारों से परे था। वह जानती थीं कि व्यक्तिगत हित से राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है। उनका पुत्र तो मृत्यु को प्राप्त हो चुका था, परन्तु उन्होंने बनवीर के षड्यंत्र से मेवाड़ राज्य की रक्षा की।

कुछ समय पश्चात् उसी उदयसिंह ने बनवीर को मारकर मेवाड़ का राज्य प्राप्त किया। उनके ही पुत्र शक्तिशाली योद्धा महाराणा प्रताप थे, जिन्होंने अपनी शूरवीरता से भारतीयों के हृदय में दीर्घकाल तक स्थान प्राप्त किया। कहा भी जाता है — “यदि पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान न किया होता तो उदयसिंह न होते। यदि उदयसिंह न होते तो महाराणा प्रताप भी न होते।”

पन्नाधायायाः त्यागः शौर्यं च जगति आचन्द्रार्क तिष्ठति। भारतीये इतिहासे वीराङ्गनानां गणनासु पन्नाधाया महत्तमं स्थानं प्राप्नोत् । पन्नाधायायाः बलिदानं सर्वान् शौर्यं, राष्ट्रभक्तिं, कर्तव्यनिष्ठां, बलिदानं, विवेकं च शिक्षयति। उच्यते एव – “यदि पन्नाधाया नाभविष्यत् तर्हि कुतो राणाप्रतापः”।

हिन्दी सरलार्थ:- पन्नाधाय का त्याग और वीरता इस संसार में सूर्य और चन्द्रमा के रहने तक अमर रहेगी। भारत के इतिहास में वीरांगनाओं की श्रेणी में पन्नाधाय ने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है।

पन्नाधाय का बलिदान सभी को वीरता, राष्ट्रभक्ति, कर्तव्यपरायणता, त्याग और जागरूकता की शिक्षा देता है। सत्य ही कहा गया है — “यदि पन्नाधाय न होतीं, तो राणा प्रताप कहाँ होते।”

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